23 October 2008

हल्ला बोल, हल्ला बोल

बहुत वर्ष पहले यहाँ उत्तर प्रदेश में पत्रकारों के ऊपर "हल्ला बोल" के नाम से हमला किया गया था. एक राजनीतिक पार्टी सपा के कुछ कार्यकर्ताओं द्वारा "हल्ला बोल" का कार्यक्रम कई दिन तक चलाया गया था. उस समय एक कविता उन हालातों पर लिखी थी, कविता में हास्य-व्यंग्य का पुट था। आज जब राज ठाकरे ने एक तरह का हल्ला बोल दिया है तो लगा कि वह कविता आज भी प्रासंगिक है.
बहुत थोड़े, लगभग नहीं के बराबर संशोधन के बाद आपके लिए प्रस्तुत है...........
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हे मराठो हमें बचाओ,
कोई मन्त्र तो हमें बताओ।
रही हमारी नैया डोल,
कुछ तो बोल, कुछ तो बोल।
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मेरा कैसा नेता तू,
नाक कटाए मेरी तू।
सुन मेरे मंत्रों के बोल,
हल्ला बोल, हल्ला बोल।
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वाह गुरु क्या बात बताई,
नैया मेरी पार लगाई।
कितने सच्चे मन्त्र के बोल,
हल्ला बोल, हल्ला बोल।
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राज ने अपना मन्त्र चलाया,
बेचारों को बहुत छकाया।
हुई स्थिति सारी डांवाडोल,
हल्ला बोल, हल्ला बोल।
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उत्तरियों से अपना बैर,
अब आयेगी उनकी खैर।
दो खोपडी उनकी खोल,
हल्ला बोल, हल्ला बोल।
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एक-दो दिन की बात नहीं,
सुनना किसी की बात नहीं।
हरदम गूंजेगे ये बोल,
हल्ला बोल, हल्ला बोल।
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1 comment:

युग-विमर्श said...

जितना आपका स्वभाव समझ पाया हूँ, यह कविता उसके अनुरूप नहीं है. काव्य स्तर भी अपेक्षाएं पूरी नहीं करता. कविता ताली बजाने के लिए नहीं होती.