23 June 2008

क्या हल है इस सामाजिक अव्यवस्था को सुधारने का?

कभी-कभी आपस में खाली बैठकी करते हुए लोगों में एक चर्चा ज्यादा रहती है कि समाज की जो स्थिति है वो सुधरेगी या नहीं? सुधरेगी तो कब? कौन सुधारेगा? इन बेवजह की चर्चाओं में आदमी का एक लंबा समय निकल जाता है। समझ नहीं आता कि समय काटने के लिए चर्चा की जाती है या फ़िर किसी तरह का बदलाव लाने के लिए चर्चा की जाती है?

इस विषय पर लिखने का विचार दो घटनाओं को देखने के बाद आया। एक तो सरकार के एक मंत्री महोदया ने आदेश दिया कि यदि किसी नावालिग़ बच्चे को गाड़ी चलते देखा जाए तो उसके माता-पिता का ड्राइविंग लाइसेंस समाप्त कर दिया जाए। दूसरी घटना थी फ़िल्म रंग दे वसंती का एक बार फ़िर देखना। इन दो घटनाओं के अलग-अलग पहलु हैं, दोनों की अपनी-अपनी अलग-अलग सोच है पर यदि सार देखें तो पता चलेगा कि दोनों समाज की समस्या से प्रभावित हैं।

पहली घटना के बारे में तो यही कि सरकार को तब तक किसी भी विषय पर कदम उठाने की जरुरत महसूस नहीं होती जब तक कि बात सर के ऊपर से न गुजरने लगे। ऐसा नहीं है कि सोलह साल से कम के बच्चे अचानक ही गाड़ी चलाने लगे हों। ट्राफिक पुलिस को भी दिख रहा है कि किसी स्कूल की ड्रेस पहने कोई भी बच्चा सोलह साल से कम उमर का ही होगा, पर न तो उसको टोका जाता है न ही उसके माता-पिता को और न ही उसके स्कूल के स्टाफ को। अब जब बच्चे चोट-चपेट का शिकार होते हैं तो सब जागरूक हो जाते हैं।

यहाँ सवाल ये उठता है कि क्या घर पर अब माता-पिता के पास इतना भी समय नहीं रह गया है कि वे देख सकें कि उनका लाडला क्या कर रहा है, कहाँ जा रहा है, किससे मिल रहा है? पहले हम जागें तब ही सरकार जागेगी।

दूसरी घटना सीधे-सीधे सरकार से सम्बंधित है। सरकार में जिस तरह का एक ढांचा बन गया है उसको देख कर लगता नहीं है कि हालत सुधरने वाले हैं। रिश्वतखोरी का आलम चरम पर है, भ्रष्टाचार चरम पर है, अधिकारी के पास समय नहीं है कि वह जनता से सीधे-सीधे मुखातिब हो सके। अब इस तरह के हालातों में आम आदमी क्या करे? प्रशासन मौन है, किसी भी अपराध पर उसको सबूत चाहिए वो भी वह लाकर दे जिसके साथ ग़लत बर्ताव हुआ है। इन हालातों में कुछ उत्साही लोग समाज को बदलने का कार्य करने को आगे बढ़ते हैं, काम भी करते हैं पर समाज में उसको स्वीकार्यता नहीं मिलती है। हालातों से मजबूर ऐसे लोग जूनून की हद तक काम करते हैं, किसी भी कदम को उठा लेते हैं। यदि सरकार, प्रशासन के अहित की बात नहीं होती है तो वह खामोश रहता है और यदि उसकी पोल खुलती नज़र आती है तो वही हाल होता है जो रंग दे वसंती में होता है। वैसे इस तरह के क्रांतिकारी बदलाव के बाद प्रशासनिक परेशानी, दवाब सहने का सबसे ताजातरीन उदाहरण बुन्देलखण्ड के बांदा की संपत पाल का लिया जा सकता है।

अब आप ही बताएं कि क्या हल है इस सामाजिक अव्यवस्था को सुधारने का?

1 comment:

दिनेशराय द्विवेदी said...

पैरहन फटा है इतना
पैबंद न लग पाएगा
बदल दो, बदल दो
जल्द से जल्द बदल दो।